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इजरायल-ईरान तनाव और पश्चिम एशिया का बदलता भू-राजनीतिक परिदृश्य: एक विस्तृत विश्लेषण


 

जय प्रकाश

पश्चिम एशिया में इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक भू-राजनीति के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। मिसाइल और ड्रोन हमलों की शृंखला, अमेरिका की भूमिका, खाड़ी देशों की तटस्थता, डोनाल्ड ट्रम्प की हालिया अरब यात्रा, और शिया-सुन्नी विभाजन जैसे कारक इस जटिल स्थिति को और गहरा रहे हैं। क्या यह केवल इजरायल और ईरान का द्विपक्षीय टकराव है, या इसके पीछे क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों की गहरी रणनीतियाँ हैं?


1. इजरायल-ईरान तनाव का वर्तमान स्वरूप

2025 में इजरायल और ईरान के बीच तनाव अभूतपूर्व स्तर पर है। इजरायल ने ऑपरेशन राइजिंग लायन के तहत ईरान के परमाणु ठिकानों (नतांज, इस्फहान, फोर्डो) और सैन्य अड्डों (करमानशाह, तबरीज) पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए। इन हमलों में ईरान की इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के प्रमुख कमांडरों—होसैन सलामी, अमीर अली हाजीजादेह, और मोहम्मद काजेमी—की हत्या हुई। जवाब में, ईरान ने ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 3 के तहत तेल अवीव, यरुशलम, और हैफा पर 100 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन दागे, जिससे इजरायल में नागरिक हताहत हुए।

  • इजरायल का रुख: प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दावा किया कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम "दशकों पीछे" धकेल दिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि उनका लक्ष्य न केवल ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करना है, बल्कि सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के शासन को अस्थिर करना भी है।
  • ईरान की प्रतिक्रिया: खामेनेई ने इजरायल को "ऐतिहासिक और कड़ा दंड" देने की कसम खाई। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने जवाबी हमलों को "आत्मरक्षा" करार देते हुए कहा कि ईरान युद्ध का विस्तार नहीं चाहता, लेकिन इजरायल की आक्रामकता का जवाब देगा। खामेनेई को सुरक्षा कारणों से तेहरान में एक गुप्त बंकर में स्थानांतरित किया गया है।

यह संघर्ष अब केवल द्विपक्षीय नहीं रहा, बल्कि लेबनान (हिजबुल्लाह), यमन (हूती), और सीरिया जैसे क्षेत्रों में प्रॉक्सी युद्धों के माध्यम से फैल रहा है।


2. अमेरिका की भूमिका और दबाव की विफलता

अमेरिका ने इजरायल का खुलकर समर्थन किया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इजरायल को 300 हेलफायर मिसाइलें और उन्नत हथियार प्रदान किए, साथ ही फारस की खाड़ी में नौसैनिक बेड़े तैनात किए। ट्रम्प ने ईरान को 60 दिन का अल्टीमेटम दिया था कि वह परमाणु कार्यक्रम रोके, अन्यथा "विनाशकारी हमला" होगा।

  • ईरान का अड़ियल रवैया: राष्ट्रपति पेजेशकियन ने अमेरिकी धमकियों को खारिज करते हुए कहा कि अमेरिका को पहले इजरायल की आक्रामकता रोकनी होगी। खामेनेई ने भी स्पष्ट किया कि ईरान "न झुकेगा, न टूटेगा।" ईरान ने यूरेनियम संवर्धन को 90% तक बढ़ाकर परमाणु हथियारों की दिशा में कदम तेज कर दिए हैं।
  • अमेरिकी रणनीति: ट्रम्प की "अधिकतम दबाव" नीति (2017-2021 की तरह) का लक्ष्य ईरान को आर्थिक और सैन्य रूप से कमजोर करना है। हालांकि, यह नीति अब तक विफल रही है, क्योंकि ईरान ने रूस और चीन के साथ रणनीतिक सहयोग बढ़ाया है। रूस ने ईरान को S-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली प्रदान की, जबकि चीन ने तेल खरीद बढ़ाकर ईरान की अर्थव्यवस्था को सहारा दिया।

अमेरिका की एकतरफा नीति ने क्षेत्र में तनाव को और बढ़ाया है, और खाड़ी देशों को इस संघर्ष में तटस्थ रहने के लिए मजबूर किया है।


3. खाड़ी देशों की चुप्पी: ईरान और फिलिस्तीन को समर्थन क्यों नहीं?

सुन्नी-प्रधान खाड़ी देश—सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बहरीन, और कतर—ईरान या फिलिस्तीन के पक्ष में खुलकर नहीं आए हैं। इसके कई कारण हैं:

  • शिया-सुन्नी विभाजन: ईरान (शिया-प्रधान) और सुन्नी-प्रधान खाड़ी देशों के बीच ऐतिहासिक वैमनस्य है। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद ईरान ने शिया प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश की, जिससे खाड़ी देशों में असुरक्षा बढ़ी। 1980-88 का ईरान-इराक युद्ध और यमन में सऊदी-हूती प्रॉक्सी युद्ध इस विभाजन के उदाहरण हैं। खाड़ी देश ईरान की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को अपने लिए खतरा मानते हैं।
  • इजरायल के साथ संबंध: 2020 के अब्राहम समझौते के बाद यूएई, बहरीन, और मोरक्को ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए। सऊदी अरब भी इजरायल के साथ खुफिया और सैन्य सहयोग बढ़ा रहा है, खासकर ईरान के खिलाफ। ट्रम्प की हालिया अरब यात्रा ने इन रिश्तों को और मजबूत किया।
  • अमेरिका पर निर्भरता: खाड़ी देश अपनी सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं। ट्रम्प ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी से मुलाकात कर ईरान के खिलाफ एकजुटता पर जोर दिया।
  • फिलिस्तीन पर उदासीनता: फिलिस्तीन का मुद्दा पहले की तरह खाड़ी देशों की प्राथमिकता नहीं रहा। वे आर्थिक विविधीकरण (जैसे सऊदी का विजन 2030) और क्षेत्रीय स्थिरता पर ध्यान दे रहे हैं। हमास जैसे समूहों को ईरान का समर्थन होने के कारण खाड़ी देश उनसे दूरी बनाए हुए हैं।

हालांकि, यमन में हूती विद्रोहियों और लेबनान में हिजबुल्लाह ने ईरान के हमलों का समर्थन किया, जो शिया-प्रधान क्षेत्रों में ईरान के प्रभाव को दर्शाता है।


4. डोनाल्ड ट्रम्प की अरब यात्रा और इसका प्रभाव

ट्रम्प की हालिया अरब यात्रा ने क्षेत्रीय समीकरणों को और जटिल किया। उन्होंने सऊदी अरब, कतर, और यूएई के नेताओं से मुलाकात की, जिसमें ईरान के खिलाफ गठजोड़ और इजरायल के साथ सहयोग पर चर्चा हुई।

  • रणनीतिक उद्देश्य: ट्रम्प का लक्ष्य ईरान को क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर अलग-थलग करना है। उनकी नीति 2017-2021 के उनके पहले कार्यकाल की "ईरान विरोधी" रणनीति का विस्तार है, जिसमें ईरान पर कड़े प्रतिबंध और इजरायल-खाड़ी देशों के बीच संबंध सामान्यीकरण शामिल था।
  • खाड़ी देशों की प्रतिक्रिया: सऊदी अरब और यूएई ने ट्रम्प की नीति का समर्थन किया, लेकिन वे प्रत्यक्ष सैन्य टकराव से बच रहे हैं। कतर ने डी-एस्केलेशन की वकालत की, जो उसकी तटस्थ मध्यस्थता की नीति को दर्शाता है।
  • प्रभाव: ट्रम्प की यात्रा ने खाड़ी देशों को इजरायल के साथ अनौपचारिक गठजोड़ की ओर धकेला है, जिससे ईरान और फिलिस्तीन को समर्थन और कमजोर हुआ है।

5. शिया-सुन्नी संघर्ष और क्षेत्रीय गतिशीलता

इजरायल-ईरान युद्ध को शिया-सुन्नी टकराव के एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा रहा है।

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: शिया-सुन्नी विभाजन इस्लाम के प्रारंभिक इतिहास से शुरू हुआ, जो खलीफा के उत्तराधिकार पर असहमति से उत्पन्न हुआ। 1979 की ईरानी क्रांति ने शिया प्रभाव को बढ़ाया, जिससे सुन्नी-प्रधान खाड़ी देशों में तनाव बढ़ा।
  • प्रॉक्सी युद्ध: सीरिया में ईरान समर्थित असद शासन, यमन में हूती विद्रोही, और इरब में हश्द अल-शाबी (PMF) जैसे समूह ईरान के प्रभाव को दर्शाते हैं। इसके विपरीत, सऊदी अरब और यूएई ने सुन्नी हितों का समर्थन किया है, जिससे क्षेत्रीय प्रॉक्सी युद्ध बढ़े हैं।
  • वर्तमान संदर्भ: इजरायल-ईरान युद्ध में सुन्नी देशों की तटस्थता दर्शाती है कि वे अप्रत्यक्ष रूप से इजरायल का समर्थन कर रहे हैं।। यह शिया समुदायों में असंतनोष को बढ़ा सकता है, खासकर यदि ईरान क्षेत्रीय शिया समूहों को और उकसाता है।।

6. 1990 का खाड़ी युद्ध: ऐतिहासिक समानताएँ और अंतर

1990 का खाड़ी युद्ध, जब इराक ने कुवैत पर कब्ज़ा किया और अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई की, वर्तमान स्थिति से कुछ समानताएँ और कई अंतर रखता है।।

  • समानताएँ:
    • अमेरिकी हस्तक्षेप: 1990 में अमेरिका ने सऊदी अरब और कुवैत की सुरक्षा के लिए सैन्य कार्रवाई की थी। आज, अमेरिका इजरायल के समर्थन में ईरान के खिलाफ है।
    • क्षेत्रीय एकजुटता: खाड़ी युद्ध में अरब देशों ने इराक के खिलाफ एकजुटता दिखाई थी। आज, सुन्नी देश अप्रत्यक्ष रूप से इजरायल का समर्थन कर रहे हैं।
  • अंतर:
    • परमाणु आयाम: 1990 में परमाणु खतरा प्रमुख मुद्दा नहीं था, जबकि आज ईरान का परमाणु कार्यक्रम संघर्ष का केंद्रीय बिंदु है।
    • शिया-सुन्नी गतिशीलता: खाड़ी युद्ध में यह विभाजन कम स्पष्ट था, क्योंकि इराक सुन्नी-प्रधान था। आज, शिया-सुन्नी टकराव क्षेत्रीय नीतियों को गहराई से प्रभावित कर रहा है।
    • वैश्विक संदर्भ: 1990 में शीत युद्ध समाप्त हो रहा था, और अमेरिका एकमात्र महाशक्ति थी। आज, रूस और चीन जैसे देश ईरान का समर्थन कर रहे हैं, जिससे वैश्विक शक्ति संतुलन जटिल है।

7. भविष्य के संभावित हालात

इजरायल-ईरान तनाव और क्षेत्रीय गतिशीलता के आधार पर निम्नलिखित परिदृश्य संभव हैं:

  • सीमित युद्ध का विस्तार: यदि इजरायल और ईरान के हमले जारी रहे, तो यह संघर्ष लेबनन (हिजबुल्लाह), यमन (हूती), और सीरिया में फैल सकता है। इससे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं, और भारत जैसे देशों की अर्थव्यवस्थाएँ प्रभावित होंगी।
  • अमेरिका का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप: ट्रम्प की चेतावनियों और सैन्य तैनाती से संकेत मिलता है कि अमेरिका प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई कर सकता है, खासकर यदि ईरान अमेरिकी ठिकानों पर हमला करता है। इससे विश्व युद्ध जैसी स्थिति बन सकती है।
  • शिया-सुन्नी गठजोड़ का पुनर्जनन: ईरान के खिलाफ सुन्नी देशों और इजरायल का अनौपचारिक गठजोड मजबूत हो सकता है, लेकिन यह शिया समुदायों में असंत को बढ़ाएगा।
  • कटनीतिक समाधान: संयुक्त राष्ट्र और G7 जैसे मंचों पर युद्धविराम की कोशिशें हो रही हैं। यदि ईरान और अमेरिका परमाणु समझौते पर सहमत होते हैं, तो तनाव कम हो सकता है, लेकिन वर्तमान में यह संभावना कमजोर है।

8. भारत के लिए निहितार्थ

भारत के लिए यह संघर्ष कई चुनौतियाँ और अवसर लाता है:

  • आर्थिक प्रभाव: लाल सागर मार्ग के बाधित होने और तेल की कीमतों में वृद्धि से भारतीय निर्यात और ऊर्जा प्रभावित हो सकती है। भारत ने पहले ही इस मुदे पर आपात बैठक बुलाई है।
  • कूटनीतिक संतुलन: भारत ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है, लेकिन ईरान और इजरायल दोनों के साथ उसके रणनीतिक संबंध हैं। भारत को इस संतुलन को बनाए रखना होगा।
  • क्षेत्रीय प्रभाव: पश्चिम एशिया में अस्थिरता भारत में रहने वाले प्रवासियों और क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है।

निष्कर्ष

इजरायल और ईरान के बीच तनाव केवल एक द्विपक्षीय संघर्ष नहीं है, बल्कि यह शिया-सुन्नी विभाजन, क्षेत्रीय शक्ति संतुलन, और वैश्विक भू-राजनीति का एक जटिल मिश्रण है। खादी देशों की तटस्थता, अमेरिका का इजरायल समर्थन, और ट्रम्प की अरब यात्रा इस स्थिति को और जटिल बना रहे हैं। 1990 के खादी युद्ध से कुछ समानताएँ हैं, लेकिन परमाणु खतरा और वैश्विक शक्ति गतिशीलता इसे और खतरनाक बनाती हैं।

पश्चिम एशिया में या तो एक बड़ा क्षेत्रीय युद्ध छिड़ सकता है, या कूटनीतिक प्रयासों से तनव कम हो सकता है[JP1] । भारत जैसे देशों को इस स्थिति में सतर्क रहते हुए अपनी रणनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं को संतुलित करना होगा। यह क्षेत्र अब एक नए भ-राजनीतिक यग की दहलीज पर खड़ा है, जहाँ हर कदम का वैश्विक प्रभाव पड़ सकता है।


 [JP1]

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